
सत्र की शुरुआत आंतरिक लेखा-परीक्षण की मूल अवधारणा एवं वर्तमान व्यावसायिक परिदृश्य में इसकी बढ़ती आवश्यकता से हुई। सीए ऋतिक सबनानी ने अपने व्यावसायिक अनुभवों एवं वास्तविक कार्यक्षेत्र से जुड़े अनेक उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि आंतरिक लेखा-परीक्षण किसी संस्था में केवल त्रुटियों को खोजने का माध्यम नहीं, बल्कि जोखिमों की पहचान, आंतरिक नियंत्रणों को सुदृढ़ करने, धोखाधड़ी की रोकथाम, प्रक्रियाओं में सुधार तथा संस्था की कार्यकुशलता बढ़ाने का महत्वपूर्ण साधन है।सत्र में आंतरिक लेखा-परीक्षण की प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप से समझाया गया, जिसमें व्यवसाय एवं प्रक्रियाओं को समझना, जोखिमों की पहचान एवं आकलन, लेखा-परीक्षण की योजना बनाना, आंतरिक नियंत्रणों का परीक्षण, आवश्यक प्रमाणों एवं अभिलेखों की जाँच, निष्कर्षों का विश्लेषण तथा सुधारात्मक सुझावों सहित प्रतिवेदन तैयार करना शामिल हैं। इस दौरान यह भी बताया गया कि एक प्रभावी आंतरिक लेखा-परीक्षक को केवल “क्या गलत है” यह नहीं देखना चाहिए, बल्कि “गलती क्यों हुई और उसे भविष्य में कैसे रोका जा सकता है” इस पर भी ध्यान देना चाहिए।अपने अनुभवों और व्यावहारिक उदाहरणों के कारण पूरा सत्र अत्यंत सरल, रोचक एवं सीखने योग्य रहा। प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक प्रश्न पूछे और चर्चा में सक्रिय भागीदारी की, जिससे सत्र और अधिक संवादात्मक बना।सत्र में चार्टर्ड अकाउंटेंट्स एवं आर्टिकल्स ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, जिनमें सीए चेतन तारवानी, सीए सिद्धांत माखीजा, लोकेश अग्रवाल, वंशिका अग्रवाल, कशिश ऐलसिंघानी, साधना साहू, मनीष असलानी, देवेश गिधवानी, मुस्कान नारा, आर्ची नानवानी, यक्षा चावला, प्रशांत माथानी, माहिर सोनी, वरुण खूबचंदानी, नैंसी शर्मा, आशीष देवांगन, आयुष देवांगन, उपासना देवनानी, करण मनवानी एवं दिव्या सोनी उपस्थित थे।समग्र रूप से यह सत्र सैद्धांतिक ज्ञान को व्यावहारिक अनुभव से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी अवसर रहा।
